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असुर सदैव बली रहेंगे, क्योंकि सुर तो केवल किसी के भरोसे हैं. ऋत् पर ही सही, निर्भर हैं. और असुर, - दुरभिसंधि मैं लगे ही सही- निरंतर कर्म- तत्पर हैं. - अज्ञेय

Tuesday, 1 March 2011

क्योंकि बच्चे किताबें फाड़ देते हैं…...


शहर के एक प्रतिष्ठित विद्यालय के पुस्तकालय की किताबों से भरी अलमारियों को ताला लगाके रखा गया है क्योंकि उनके खुला रहने पर कुछ विद्यार्थी पुस्तकें चुरा ले जाते हैं या उन्हें फाड़ देते हैं. यहां मूल प्रश्न विद्यार्थियों की अनुशासनहीनता का नहीं है बल्कि पुस्तकालय की अलमारियों को ताला लगाने का है. वास्तव में ये एक गंभीर किस्म की गलती है, भले ही ये अनजाने में ही क्यों ना की जा रही हो.
            ये बड़ा स्वाभाविक है कि कुछ विद्यार्थी पुस्तकालय की मर्यादा को भंग कर सकते हैं मसलन, कुछ किताबों के पृष्ठ फाड़ लेना या कि किसी किताब को चुरा लेना. परंतु लड़कपन की इस नासमझी के कारण पुस्तकालय की अलमारियों को ताला लगा देना विद्यार्थियों में पनप रहे पुस्तक प्रेम के संस्कार की भ्रूणहत्या है. क्या ये वाकई बहुत बड़ी चिंता का विषय नहीं है कि मनुष्य को संस्कारित करने वाली और समाज को रहने लायक बनाने वाली किताबों को बच्चों से दूर रखा जा रहा है. ये कहना जरा मुश्किल है कि ठीक ऎसा ही कितने विद्यालयों में हो रहा है, परंतु विद्यालयी पुस्तकालयों में विद्यार्थियों के बेहिचक प्रवेश और आवा-जाही की संस्कृति विकसित होना अभी शेष है. मुझे अपने बचपन का विद्यालय याद आता है जिसके पुस्तकालय के अंधेरे-से कमरे की किताबों से लदी-फदी बड़ी-बड़ी अलमारियां मुझमें रहस्य और आकर्षण का एक अजीब-सा भाव जगाती थीं.परंतु कभी बेहिचक उसमें आने-जाने और किताबों को देखने-छूने की कोई परंपरा उस समय मेरे लिए रही हो, मुझे याद नहीं आता. कमोबेस यही स्थिति आज भी कायम है. बल्कि ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि विद्यालयी स्तर पर पनपा पुस्तकों से दूरी का ये संस्कार ही आगे जाकर लेखकों और प्रकाशकों की इस शिकायत का कारण बनता है कि लोग पुस्तक नहीं पढ़ते.
     क्या ये अच्छा नहीं हो कि पुस्तकालय के किसी एक कोने में विभिन्न विषयों की ढेर सारी रोचक और मज़ेदार किताबें किसी टेबल पर इस तरह रखी जाएं कि बच्चे उन की ओर लुभाएं और उन्हें पढ़ें. क्या हमारे विद्यालयी पुस्तकालयों को आधुनिक बाज़ार की तरह नहीं होना चाहिए जहां हर चीज बिना मांगे-चाहे जबरदस्ती दिखाई जाती है. देखा जाए तो बच्चों में पुस्तक प्रेम विकसित करना और पढ़ने की स्वाभाविक प्रवृति का विकास करना ही विद्यालयी पुस्तकालयों का मुख्य उद्देश्य भी होता है. मैं ये मानता हूं कि बिना इस बात का इंतजार किए कि बच्चों में पढ़ने और चुनने की समझ विकसित हो, उन्हें ढेरों किताबों के बीच रहने दिया जाए तो बहुत जल्दी उनमें चुनाव और रुचि दोनों का विकास हो जाएगा. वास्तव में किताबों का आस-पास रहना ही व्यक्ति में सकारात्मक बदलाव ला देता है. रद्दी और पुरानी किताबें बेचने वाला अनपढ़-गंवार भी आचरण में शिष्ट होता है.
किसी भी जीवंत पुस्तकालय की अलमारियां कभी भी व्यवस्थित नहीं रह सकतीं और ये कहना ठीक ही होगा कि पुस्तकों पर धूल जम जाए इससे अच्छा है कि उन्हें देते-लेते रहा जाए. साथ ही किसी सीलन भरी अलमारी के बंद ताले में सड़ जाने से तो कहीं अच्छा है कि हमारी कुछ किताबों के पन्ने फ़ाड़ लिए जाएं या कि उन्हें चुरा लिया जाए. पढ़ते-पढ़ाते किसी किताब का फ़ट जाना बेहतर भविष्य का संकेत है.


1 comment:

  1. आपकी चिंता जायज और बेहद प्रासंगिक है राजीव साहब। ज्यादातर विद्यालयों में पुस्तकालयों के यही हाल हैं। सिर्फ अपवादों पर खुश रहना चाहें हम तो ये और बात है। ... को सन्मति दे भगवान...।

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