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असुर सदैव बली रहेंगे, क्योंकि सुर तो केवल किसी के भरोसे हैं. ऋत् पर ही सही, निर्भर हैं. और असुर, - दुरभिसंधि मैं लगे ही सही- निरंतर कर्म- तत्पर हैं. - अज्ञेय

Sunday, 24 April 2011

पेड़, परिंदे और मेरा बचपन


मैं समझता हूं प्रकृति के साथ मनुष्य को कोई भी रिश्ता बनाना नहीं पड़ता है क्योंकि वह तो स्वजात है, बल्कि प्रकृति से दूरी के लिए मनुष्य को अनेक प्रयास करने पड़ते हैं और बड़ी मुश्किल से ही वह प्रकृति से अपनी भिन्नता स्थापित कर पाता है. पेड़ और प्रकृति से यह स्वजात बंधन प्रत्येक प्राणी का जीवन है. मेरे बचपन की जो सबसे गहरी यादें हैं, उनमें अधिकांश पेड़ और प्रकृति से जुड़ी हैं.पौधशाला की थैलियों में उगे छोटे-छोटे पौधों से लेकर बेर, नीम, शिरीष और खेजड़ी के विशाल पेड़ और उन पर चहचहाते अनगिनत परिंदे और छोटे जानवर मेरी स्मृति में आज भी सजीव हैं. घर बहुत बड़ा था जिसमें बहुत सारे घने और छोटे-बड़े पेड़ थे. बचपन से ही मैं उनको निहारा करता था.
        मेरी स्मृति के प्रथम पेड़ो में गांव के घर में उगी कुछ झाड़ियां और नीम के  छोटे पेड़ मुझे याद आते हैं. ये झाड़ियां मेरे कद से बहुत ऊंची नहीं थीं और मैं अपने हमउम्र बच्चों के साथ बेहद नुकीले कांटों से बचते हुए उनके बेर तोड़ने में सफल हो जाता था.इन झाड़यों से कुछ बड़े, बेहद प्यारे, नीम के कुछ किशोर पेड़ भी मेरी स्मृति में शेष हैं. सच कहूं तो आज वो सभी पेड़ मुझे मेरे बचपन के साथी की तरह याद आ रहे हैं जो समय के साथ कहीं दूर छूट गए हैं.इन झाड़यों की आड़ में पकड़म-पकड़ाई खेलते हुए ना जाने कितनी बार ये हमारे साथ दौड़ती और थमती थीं. उनमें से अनेक पेड़ लगभग मेरे साथ ही बड़े हुए परंतु आज वो मनुष्य की निरंतर विस्तार की प्रवृत्ति की भेंट चढ़ गए और केवल स्मृति शेष हैं .
                  इन्हीं छोटी झाड़यों के बीच एक विशाल बुजुर्ग पेड़ जो अपनी उपस्थिति में ढेर सारी बेफिक्री-सी समेटे रहता था मुझे बड़ी शिद्दत से याद आता है. वो एक बहुत बड़ा और पुराना बेर का पेड़ था. वैसे हम लोग उसे भी झाड़ी ही कहते थे. उसकी बड़ी-बड़ी ऐंठी हुई, काली और सख्त भुजाओं में ना जाने कितना बल था कि मौहले भर के बच्चे उन पर झूल जाते थे परंतु वो नहीं थकती थीं. बहुत पुराना और विशाल भुजाओं वाला वह पेड़ घर के किसी बुजुर्ग की-सी आत्मीयता से हम बच्चों को जैसे दुलारता रहता था. हमारी अनेक दोपहरें उस पेड़ की घनी छांव में खेलते हुए बड़ी मस्ती से कटी थीं. उस पेड़ के अपने, केवल हम बच्चे ही नहीं थे बल्कि वह सैंकड़ों दूसरे जानवरों का भी घर था. ना जाने कितनी चिड़ियां, गिलहरियां, कोए, तोते और कुछ दूसरे जानवर उस पेड़ पर अपना घर रखते थे. उस पेड़ की कुछ शाखाएं ज़मीन के बहुत पास झुकी हुई थीं मानो हर अपने पास आने वाले को गले लगा लेना चाहती हों. उस पेड़ से जुड़ी एक और मधुर स्मृति मुझे याद है. शाम ढलते-ढलते उस पेड़ पर रैन-बसेरा करने वाले पक्षियों की संख्या बहुत बढ़ जाती थी. चिड़ियों के कई-कई झुंड़ ना जाने कहां-कहां से आकर उस पेड़ पर जैसे लद जाते थे.उस समय मुझे लगता है जैसे पेड़ की खुशी भी कई गुना बढ़ जाती थी. चिड़ियों के कलरव में पेड़ का पत्ता-पत्ता जैसे संगीतमय हो जाता था. गोधूलि की वो बेला हम बच्चों के लिए विशेष सौगात लेकर आती थी. पक्षियों की उछलकूद और फड़फड़ाहट से, अनेक बेर जो हमारी पहुंच से बहुत ऊंचे लगे होते थे, ज़मीन पर आ गिरते थे और हम बच्चों का झुंड़ उन बेरों की ताक में कई-कई देर तक उस पेड़ के नीचे डटा रहता. सचमुच वो एक उत्सव-सा होता था जब पेड़, परिंदे और हम बच्चे एक अकथनीय रोमांच से भरकर एक ऐसी दशा में पहुंच जाते थे जो आज मुझे दुर्लभ है.चिड़ियों के झुंड़ आपस में और पेड़ से ना जाने क्या बातें करते थे परंतु आज सोचता हूं तो लगता है वो निश्चय ही उनके बीच का कोई ऐसा संवाद था जो उनकी आत्माओं से जुड़ा था. पेड़ जैसे दिनभर की बातें बड़े उत्साह और प्यार से सुन रहा होता.रात होने के साथ ही सारे परिंदे और गिलहरियां जैसे मीठी नींद में सो जाते. बुजर्ग पेड़ की सुरक्षित पनाह में.
                इसके बाद एक और पेड़ जो मेरी स्मृति में आज भी हरा-भरा है, वो एक शिरीष का पेड़ था. वही शिरीष जिसे हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उसके स्वभाव के कारण अवधूत कहा है. हम उसे अपभ्रंश में सरेस कहते थे. उसका तना थोड़ा ऊपर जाकर बराबर की तीन शाखाओं में फंट गया था. तब वह पेड़ बहुत बड़ा नहीं था और मैं अपने कुछ हमउम्र साथिओं के साथ थोड़े से प्रयास से उस पर चढ़ जाता था.उस पेड़ की पतियां बेहद कोमल और हरी होती थीं , खासकर पतझड़ के बाद जब उस पर नई कोंपलें निकला करती थीं. उसके फूलों की खुशबू मुझे आज भी रोमांचित-सा करती है. कोमल रेशों वाला उसका फूल हम बच्चों को बेहद पसंद था. हम उसके फूलों का गुच्छा बना लिया करते थे और देर तक उनसे खेला करते थे.
         मुझे याद आता है तब मैं थोड़ा बड़ा हो रहा था और उन दिनों मुझे अकेले में रहना अच्छा लगता था. घर में ज्याद देर तक इस तरह का एकांत संभव नहीं होता था अत: मैं कई बार उस छोटे परंतु घने छायादार पेड़ पर चढ़कर बैठ जाता था. कभी-कभी तो मैं देर तक अकेला या किसी साथी के साथ उस पेड़ पर बैठा रहता और घर में किसी को पता नहीं रहता मैं कहां हूं?
               पेड़ों के साथ इस लगाव ने धीरे-धीरे मेरे मन में पक्षियों और दूसरे जानवरों के प्रति भी विशेष लगाव जगा दिया जो आज तक कायम है.पेड़ और प्रकृति से प्रेम का ये गहरा संस्कार मुझमें कैसे पड़ा कहना मुश्किल है परंतु पेड़-पौधों से घिरे परिवेश ने ही शायद मुझे प्रकृति से प्यार करना सिखाया. यहीं पर मुझे अनायास ही एक बूढ़ी जैन औरत का ख्याल आ रहा है जो हर मिलने-जुलने वाले को कुछ शपथ दिलाया करती थी. हमारा उनके घर आना-जाना था सो कभी-कभी उससे मुलाकात हो जाती थी. उसके पास ढेर सारी शपथें हुआ करती थीं जिसमें से एक जो मुझे याद आ रही है कि –“ आज, दो दिनों तक , सप्ताह भर या महीने भर तक(सामने वाले की सुविधानुसार) तुम हरा पेड़ नहीं काटोगे.” उसकी यह शपथ कभी-कभी उम्रभर के लिए भी हुआ करती थी. मुझे नहीं मालूम उसकी उन शपथों से पर्यावरण का कितना लाभ हुआ परंतु किसी भी धर्म के मूल में छुपी इस तरह की बातों को जानकर वर्तमान में उसकी विकृत दशा पर अफसोस ही किया जा सकता है. मुझे याद आ रहा है, बाद के दिनों में वर्षों तक मैं उस शिरीष के पेड़ तले पक्षियों को दाना-पानी डालता रहा था.वहां आने वाले कई पक्षियों को मैं पहचानने लगा था और मुझे महसूस होता है कि उन पक्षियों को भी उन दिनों मुझ पर भरोसा-सा था, तभी तो वो ठीक समय पर वहां पहुंच कर जैसे मेरा इंतजार करते थे.अपने इसी पक्षी प्रेम के कारण बचपन में मैंने अनेक पक्षी पाले. (शेष अगली बार)  

………उन्हीं दिनों की बात है, तोते के प्रति मेरा ज़ुनून इस हद तक बढ़ गया था कि एक बार मैंने एक बेहद स्वस्थ और बड़े तोते को पेड़ की आड़ से झपट्टा मार कर पकड़ लिया था. आज सोचता हूं तो आश्चर्य होता है कि इतने फुर्तीले जानवर को मैं कैसे पकड़ पाया था, बिना किसी सामान्य Kk के भी.बहुत बाद में जाकर मुझे समझ आई कि परिंदों को इस तरह पिंजरे में रखना उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं है ओर तब मैं केवल किसी बीमार ज़ानवर को ही पिंजरे में रखता. मुझे याद है मेरे प्यार और देखभाल ने उन दिनों कई जानवरों और पक्षियों का सफ़ल उपचार किया था.बाद में आस-पास के जान-पहचान वाले भी इस तरह का कोई पक्षी या जानवर देखते तो मुझ तक पहुंचा देते थे. काश मैं वो सब करना जारी रख पाता.
            यहीं पर मेरी स्मृति में बेर के दो और बड़े पेड़ सीधे खड़े हैं. वो दोनों दो बड़ी झाड़ियां थीं परंतु उनमें से एक कुछ अधिक पुरानी थी और दूसरी थोड़ी बाद की. शायद दोनों मा-बेटी रही हों. वो दोनों थोड़े ही फासले पर पास-पास ही उगी थीं. कद-काठी में भी दोनों लगभग बराबर थीं परंतु देखने से ही लगता था कि उनमें से एक अधिक पुरानी और बुजुर्ग है. उन दोनों पर बेहद फ़ल आते थे. बहुत मीठे भी. उनमें से बुजर्ग झाड़ी कुछ सरल और कम कांटों वाली थी और हम उस पर आसानी से चढ़ जाया करते थे. उसके नीचे बालू मिट्टी का टीला था. झाड़ी पर चढ़कर हम अक्सर उस टीले पर कूदा करते थे. हमारे उस खेल में वो झाड़ी जैसे बराबर की शरीक होती थी और कभी इतनी ऊंची नहीं बढ़ी कि हम उस पर ना चढ़ पाएं. इस बात में कतई कोई तार्किक संबंध नहीं नज़र आता है कि किसी कारण से, जब छोटी झाड़ी को काट दिया गया तो थोड़े ही अंतराल से वह बुजुर्ग झाड़ी भी सूख गई परंतु पेड़ो को सजीव साबित कर देने वाले विKkन के पास शायद इस बात का भी कोई तर्क हो और तब मैं कह सकूंगा कि उन दोनों के बीच वाकई कोई संवेदना सूत्र था जो थोड़ी दूरी के बावज़ूद उन दोनों को जोड़े हुए था. उन दोनों झाड़ियों के प्रति मेरी संवेदनाएं आज भी सजीव हैं और जब कभी भी मैं उन दोनों शांत पेड़ों को याद करता हूं तो मन वाकई भारी-भारी सा हो जाता है.
            वो एक बेहद गर्म दोपहर थी. मैं कुछ हमउम्र बच्चों के साथ घर के पिछवाड़े खड़े एक औसत कदकाठी के नीम के पेड़ पर चढ़कर खेल रहा था. नीम का वह पेड़ एक टीले की ढलान पर उगा हुआ था और शायद इसी कारण वह टीला भी वहां पर कुछ स्थाई-सा हो गया था. पेड़ बहुत बड़ा  नहीं था और उसकी कुछ डालियां नीचे की और झुकी हुई थीं. उनमें से कुछ डालियों को हमने लपककर इतना नीचे झुका लिया था कि उनके सहारे हम उस पेड़ पर चढ़-उतर सकते थे. बंदरों की तरह झूलते हुए पेड़ पर चढ़ना-उतरना और निबोलियां खाना, सचमुच वो  एक लाज़वाब खेल था जिसके आगे आधुनिकता के सारे उपकरण फीके ही नहीं बेजान भी नज़र आते हैं. मुझे याद आता है चढ़ने-उतरने के ऐसे ही किसी प्रयास में एकबार डाली अचानक टूट गई और मैं डाली समेत मिट्टी में आ गिरा. परंतु यह सुखद संयोंग ही रहा कि कई बार पेड़ो से फिसलने और गिरने के बावज़ूद कभी कोई ऐसी चोट नहीं आई जो मुझे पेड़ो से दूर करती. मुझे अच्छी तरह याद है मैं उस दिन और उसके बाद भी उस पेड़ पर वैसे ही खेलता रहा था.
            इन सब पेड़ों के साथ मुझे एक खेजड़ी का पेड़ भी याद आता है जिस पर बैठकर कभी मैंने एक कविता लिखने की कोशिश की थी. आज मैं समझ सकता हूं कि वो कविता कैसी बनी होगी परंतु पेड़ और प्रकृति ने मुझे हमेशा ऐसे ही प्रेरित किया है और मैं मुल्यांकन कर सकता हूं कि लिखने का वह शुरुआती प्रयास एकदम व्यर्थ नहीं गया है. मुझे याद पड़ रहा है, वह सावन का कोई सुहाना दिन था. आसमान काली घटाओं से घिरा था और एक संक्रामक किस्म का आनंद जैसे पूरी कायनात पर छाया हुआ-सा था. पक्षी अधिक चहक रहे थे,फूल कुछ अधिक सूर्ख लग रहे थे, पेड़ों की फुनगियां जैसे किसी लय में झूम रही थीं. बच्चे भी बरसात में नहाने की उम्मीद में अपने कपड़े उतारकर कुछ इस तरह चिल्ला रहे थे कि जिसके आगे दुनिया का कोई भी संगीत फीका नज़र आता है.ये मोरों के नाचने और पपिहों के गाने का समय था. विधाता ने कोयल को अगर वसंत में गाने को ना कहा होता तो मुझे यकीन है वो भी ऐसे मौसम में ज़रूर गाती. उस दिन बरसात आई कि नहीं मुझे याद नहीं परंतु जब कभी भी बारिश आती है मेरा रोम-रोम जैसे झूम उठता है. असम के अपने लगभग चार साल के प्रवास में भी मैंने कई बार प्रकृति का वैसा लुभावना और सम्मोहनकारी रूप देखा है जिसकी ढेर सारी स्मृतियां मेरे मन में अंकित हैं, जिनके लिए फिर कभी अवकाश होने पर लिखूंगा. खेजड़ी का वह हरा पेड़ मुझे आज भी अपना-सा लगता है. 
                  मेरी स्मृति में नीम का एक और बहुत विशाल पेड़ किसी चित्र की भांति छपा है. वह पेड़ मेरे घर में नहीं था बल्कि मेरे स्कूल के रास्ते में था. गली में चोराहे के बीचों-बीच खड़ा वह पेड़ इतना विशाल होकर भी रास्ते को फांटता नहीं था बल्कि उस मोहल्ले के चारों कोनों से लोग आकर उस पेड़ के नीचे अपनी दोपहरें ठंडी करते थे.जाने कितने ही बच्चे उस पेड़ की डालों पर बंदरों की तरह झूलते रहते थे. अनगिनत पक्षी हरदम उस पेड़ पर चहकते रहते थे. निबोली के दिनों में उसके नीचे हरी-पीली निबोलियों की जैसे चादर-सी बीछ जाती थी. क्या पक्षी, क्या जानवर ,क्या बच्चे सभी उसकी निबोली खाते थे और वो था कि सबको खिलाकर भी उतना ही अमीर उतना ही हरा-भरा, भरा-भरा. मैं अक्सर दिन में दो बार उस पेड़ के नीचे से गुजरता था. मैं जब भी उस पेड़ के नीचे से गुजरा उसने हर बार मुझे बुलाया. मुझे आज भी अफसोस होता है, उस पेड़ के नीचे देर तक ना बैठ पाने का.सचमुच बहुत बड़ा था उसका दिल.उन दिनों उसके नीचे चारों धाम बसते थे, काबा और काशी भी. बाद के दिनों में जाने क्यूं लोगों को उसका बड़प्पन पसंद नहीं आया और उसकी बड़ी-बड़ी भुजाओं पर आरी चला दी. चौराहे का वह पेड़ आज भी खड़ा है परंतु उतना घना और विशाल नहीं बल्कि आदमी की तरह संकुचित और उदास-सा.
            यादों के इस जंगल में बहुत सारे ताड़(सफेदा) के पेड़ भी एक सीधी कतार में उगे हैं.मुझे बहुत अच्छी तरह याद है मेरे घर में गली की तरफ करीब बीस-तीस बहुत ऊंचे और सीधे ताड़ के पेड़ हुआ करते थे. वो पेड़ बहुत पुराने नहीं थे परंतु पंद्रह-बीस वर्ष की उम्र में ही उनमें से कुछ पेड़ तो बहुत मोटे और लंबे हो गए थे. पतझड़ के दिनों में उन पेड़ों से ढेर सारे पत्ते गिरते रहते थे. इन पत्तों से परेशान होकर एकबार उन्हें ऊपर से कटवाने की योजना बनाई गई परंतु इतना ऊंचा चढ़कर उन्हें छांगना (काटना) कोई आसान काम नहीं था और इस कठिन काम के लिेए किसी ने भी हामी नहीं भरी. बाद में एक गरीब, कमउम्र बच्चे ने यह दुरूह काम किया. आज जब उस बच्चे के बारे में सोचता हूं तो बड़ों की गैरजिम्मेदारी और उस बच्चे की हिम्मत दोनों ही मुझे आश्चर्यचकित करती हैं.बाद में उन पेड़ों ने जैसे उस बच्चे को पहचान लिया था और वो हर वर्ष उसकी छोटी कुल्हाड़ी से अपनी बेतरतीब बढ़ी शाखा-प्रशाखा को जैसे संवराते रहते थे. सचमुच उन पेड़ों ने ही उस बच्चे का ख्याल किया होगा नहीं तो उन खंभे जैसे सीधे और चिकने पेड़ों पर खतरा कम नहीं था. कतार में खड़े ताड़ के वो सुंदर पेड़ मेरे घर की पहचान थे. गली से गुजरते राहगीर उन पेड़ों के नीचे से कभी नज़र झुकाकर नहीं गुजरे. उन पेड़ों ने सभी का सर ऊंचा रखा. बाद के दिनों में यकीनन बिना किसी अपरिहार्य कारण के उन उन पेड़ों को एक साथ काट दिया गया. उनमें से एक-एक पेड़ का कटकर गिरना मुझे आज भी याद है और ये भी कि मैंने अपनी छोटी समझ के आधार पर इसका विरोध भी किया था परंतु एक-एक पेड़ किसी भीमकाय शूरवीर की तरह धराशाई होता गया. अपने उन हरेभरे सपूतों को इस तरह उजड़ता देखकर धरती जरूर उस दिन रोई होगी. ना जाने कितने परिंदे उस रात सो नहीं पाए होंगे. हवाओं में ज़हर कुछ बढ़ गया होगा. उन पेड़ों के कटने से गली से गुजरने वाले राहगीरों की नज़रें झुक गईं.
            यादों के इस जंगल में और भी अनेकों-अनेक छोटे-बड़े पेड़ लहलहा रहे हैं और हरेक का एक लंबा किस्सा है.कुछ छोटे पौधों और पेड़ों को लगाने और सींचने के लंबे किस्से मुझे पूरे के पूरे याद हैं. एक-एक की कहानी कहने लगूं तो शायद कभी खतम ही ना हो. बस यूं ही कुछ बहुत याद आने लगे थे. सचमुच वो सब पेड़ बड़ाई के काबिल हैं जिनका रेशा-रेशा जीवन को समर्पित है. बिना किसी प्रत्याशा के सबकुछ लुटाकर भी ठूंठ हो जाने तक परोपकारी रहना पेड़ो से बेहतर भला कौन जानता है. सचमुच वंदनीय है यह हरियाली जिसका तृण-तृण जीवन से सराबोर है.  
   

                           
-संदर्भ- पृथ्वी दिवस   

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