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असुर सदैव बली रहेंगे, क्योंकि सुर तो केवल किसी के भरोसे हैं. ऋत् पर ही सही, निर्भर हैं. और असुर, - दुरभिसंधि मैं लगे ही सही- निरंतर कर्म- तत्पर हैं. - अज्ञेय

Wednesday, 13 April 2011

मंदिर के देवता


शनिवार की एक उजली सुबह
शहर की मुख्य सड़क पर बने
उस छोटे-से मंदिर में
यूं तो रोज़ ही भीड़ रहती है
परंतु आज का दिन कुछ खास था
शनी देव और उनके भक्तों का तो पता नहीं
परंतु मंदिर के पास
फुटपाथ पर बैठे भिखारियों के लिए
सप्ताह का हर शनिवार
मतलब भरपेट भोजन
कुछ भक्त बड़े गर्व और श्रद्धा से
छोला-पूरी बांट रहे थे
सभी भिखारी जैसे सप्ताह भर का खाना
आज ही खा लेना चाहते थे
वो बड़ी तत्परता से पूरियां झटक रहे थे
मैंने देखा-
भक्तों के हाथ
बड़ी सावधानी बरत रहे थे
नहीं, आप गलत समझ रहे हैं
उनकी सावधानी भोजन के प्रति नहीं थी
बल्कि भिखारियों की तमाम तत्परता के बावज़ूद
कुछ पूरियां नीचे गिर जाती थीं
हां इस बार आप ठीक सोच रहे हैं
भक्तों की संपूर्ण एकाग्रता इस बात में थी
कि उनका हाथ उन गंदे भिखारियों से ना छू जाए
वो लगभग-लगभग कुत्ते की तरह
उन्हें पूरियां फेंक रहे थे
भूखे को भोजन देना उनका संस्कार था
विश्वास नहीं
उनकी सारी श्रद्धा अपने ईष्ट के प्रति थी
जो इन गंदे भिखारियों में तो
बिल्कुल नहीं बसता
मैंने देखा
मंदिर के देवता अपने भक्तों की अटूट आस्था पर
मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे.  

1 comment:

  1. उनकी सारी श्रद्धा अपने ईष्ट के प्रति थी
    जो इन गंदे भिखारियों में तो
    बिल्कुल नहीं बसता---

    इस धारदार तेवर के लिए बधाई...

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