पेड़ की छाया में
ठेले पर लेटे उस आदमी को
जब मैंने जगाया
तो किसी सिपाही की तरह
चौकन्ना होकर उठ बैठा था वह
मेरी हल्की-सी आवाज ने
उसकी नींद से भरी आंखों में
उम्मीद के दीये-से जला दिए थे
काम बताकर जब मैंने पैसे पूछे
बड़ी सहजता से बोला वह
सत्तर रुपये
होशियारी दिखाते हुए मैंने कहा
पचास रुपये ठीक रहेगा... ?
मेरी होशियारी जो किसी काम नहीं आई थी
उस समय पस्त पड़ गई
जब उसने कहा-
बाबूजी ! सौ रुपये ले लूंगा
तब भी कल ठेला ही चलाना पड़ेगा
उसकी इस एक बात ने
मुझे जैसे पानी-पानी कर दिया
सचमुच कितना गहरा जीवन बोध था
उसके इस आत्मकथ्य में
ठेला चलाना और
ठेला चलाते हुए जिंदगी गुजार देना
दो मुख्तलिफ़ बातें हैं
सड़क पर खड़ा
मैं देर तक अपनी औकात
और उसकी हैसियत के बारे में सोचता रहा.
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