धरती से आकाश तक फैली है
प्रेम की दुहाई
प्रेम ही तो बौराया है
तलहटी की उस अमराई में
प्रेम ही ने सजाए हैं तितली के पंख
प्रेम ही तो ठुमकता है सावन की पुकार पर
मोर के पंख लगाकर
कुलांचे भरता है
हिरणों के साथ
सप्तम स्वर में गूंजता है
कोयल के कंठ से
प्रेम ही फूटता है
धरती की कोख से
पहली बारिश के बाद
अंखुए बनकर
उम्र की तरुणाई में झांकता है
कच्चे गालों से
और रचता है
दुनिया की सबसे अच्छी और सच्ची कविता
प्रेम ही ने तो बसाया है
धरती के पहले आदमी को
सचमुच सृष्टि का संपूर्ण जीवन
एक प्रेमगीत है.
वाह राजीव साब! क्या बात है....
ReplyDeleteसचमुच सृष्टि का संपूर्ण जीवन
एक प्रेमगीत है...
It's very interesting......
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