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असुर सदैव बली रहेंगे, क्योंकि सुर तो केवल किसी के भरोसे हैं. ऋत् पर ही सही, निर्भर हैं. और असुर, - दुरभिसंधि मैं लगे ही सही- निरंतर कर्म- तत्पर हैं. - अज्ञेय

Wednesday, 13 July 2011

प्रेमगीत


धरती से आकाश तक फैली है
प्रेम की दुहाई
प्रेम ही तो बौराया है
तलहटी की उस अमराई में
प्रेम ही ने सजाए हैं तितली के पंख
प्रेम ही तो ठुमकता है सावन की पुकार पर
मोर के पंख लगाकर
कुलांचे भरता है
हिरणों के साथ
सप्तम स्वर में गूंजता है
कोयल के कंठ से
प्रेम ही फूटता है
धरती की कोख से
पहली बारिश के बाद
अंखुए बनकर
उम्र की तरुणाई में झांकता है
कच्चे गालों से
और रचता है
दुनिया की सबसे अच्छी और सच्ची कविता
प्रेम ही ने तो बसाया है
धरती के पहले आदमी को
सचमुच सृष्टि का संपूर्ण जीवन
एक प्रेमगीत है.

2 comments:

  1. वाह राजीव साब! क्या बात है....

    सचमुच सृष्टि का संपूर्ण जीवन
    एक प्रेमगीत है...

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  2. It's very interesting......

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