वो देख रहे थे
नए बने एक भवन को
भवन जिसके निर्माण के लिए
कई बैठकें हुई थीं
पास हुआ था एक बहुत बड़ा बजट
जिसका कुछ हिस्सा
बंट गया था इधर-उधर
एक-दूसरे को खुश करने में
अब बनकर तैयार था
अहं भाव से निहारते हुए
कुछ कतर-ब्योंत
कुछ सलाहों और मशवरों के साथ
लगभग-लगभग संतुष्ट थे सभी
तमाम आशंकाओं के बावज़ूद ईंटें कम नहीं पड़ी थीं
औपचारिक निरीक्षण के बाद.......
खाली भवन में गूंज रहे थे
उनके सजावटी ठहाके
नए भवन को सराहते हुए
सब चले गए थे
संतुष्टी की कोफी पीने
मगर किसी ने नहीं देखा
धूल-मिट्टी में सना एक कारीगर
अभी भी घुल रहा था
दो जून की चिंता में
बीन रहा था कंकड़-पत्थर
छूट गए थे जो
भवन बनाते समय इधर-उधर
किसी ने नहीं चीन्हा
किसी ने नहीं सराहा
उसके काम को
उस जैसे हजारों कारीगरों को
अक्सर छूट जाते हैं जो
इमारत बन जाने पर
इधर-उधर............. कंकड़-पत्थर की तरह.
jabardast kavita!
ReplyDeletemanviya samvednaon par aapki pakad kabile-tareef hai mitra. banayen rakhen.
aapne marmik andaj me karigar ki vyatha darshate huye bhrisht tantra ko bhi benakab karne ki achhi koshish ki he. rachna kabil-e-tarrif he. keep it up.
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