जब मैं गांव से गुजरा
पनघट सूना था
ना रस्सी थी ना बाल्टी
जगत टूटी थी
और घिरनी भी
कुछ आगे पीपल के नीचे
धूप सुस्ता रही थी
अकेली... एकदम अकेली
और कुछ आगे
जहां बैठा करती थी गायें
किसी ने अतिक्रमण कर लिया
मैंने देखा...
ऊंचे कंगूरे पर बैठा था एक गिद्ध
और कुछ कौवे भी
कि अचानक मेरी नज़र घूमी
मंदिर के बगल में मस्ज़िद बनी थी
देखकर आगे बढ़ गया
कच्ची गली से सड़क पर चढ़ गया
और जहां उड़ा करती थी गोधूलि
सिर्फ धूल नज़र आई
जब मैं गांव से गुजरा......
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