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असुर सदैव बली रहेंगे, क्योंकि सुर तो केवल किसी के भरोसे हैं. ऋत् पर ही सही, निर्भर हैं. और असुर, - दुरभिसंधि मैं लगे ही सही- निरंतर कर्म- तत्पर हैं. - अज्ञेय

Thursday, 19 May 2011

बदलाव

जब मैं गांव से गुजरा
पनघट सूना था
ना रस्सी थी ना बाल्टी
जगत टूटी थी
और घिरनी भी
कुछ आगे पीपल के नीचे
धूप सुस्ता रही थी
अकेली... एकदम अकेली
और कुछ आगे
जहां बैठा करती थी गायें
किसी ने अतिक्रमण कर लिया
मैंने देखा...
ऊंचे कंगूरे पर बैठा था एक गिद्ध
और कुछ कौवे भी
कि अचानक मेरी नज़र घूमी
मंदिर के बगल में मस्ज़िद बनी थी
देखकर आगे बढ़ गया
कच्ची गली से सड़क पर चढ़ गया
और जहां उड़ा करती थी गोधूलि
सिर्फ धूल नज़र आई
जब मैं गांव से गुजरा......

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