पिछले दो-तीन दिनों से भारत और पाकिस्तान के संबंधों को लेकर कई भड़काऊ संदेश मोबाइल पर आ-जा रहे हैं. ज़ाहिर है ऐसा पाकिस्तान में भी हो रहा होगा. कारण दोनों देशों के बीच होने वाला क्रिकेट का सेमी फ़ाइनल मैच है. अब जबकि मैं ये आर्टिकल लिख रहा हूं दूरदर्शन पर मैच चल रहा है. ठीक इसी समय पड़ौसियों के घरों से और गली से भी बार-बार शोर भी सुनाई दे जाता है जो खेल के पक्ष में नही बल्कि भारत के पक्ष में हो रहा है.
भारत और पाकिस्तान के बीच जब भी कोई क्रिकेट मैच होता है तो मैं बड़े गौर से ये बात देखने की कोशिश करता हूं कि दोनों देश कितने सौहार्द से खेलते हैं? तमाम सावधानी और संतुलन के बावज़ूद दोनों देशों के बीच का स्थाई भाव बीच-बीच में प्रकट हो ही जाता है. खेल और क्रिकेट विशेषK इस मैच की जो व्याख्या करें परंतु इस आयोजन के कुछ दूसरे पहलू जो मुझे लगता है उपेक्षा करने योग्य नहीं हैं, के बारे में मैं अक्सर सोचता हूं. इस मुकाबले का जो सबसे खतरनाक और विचारणीय पहलू है वह इसमें निहित दोनों देशों की एक दूसरे के प्रति कटुता और ऐतिहासिक दुश्मनी है जो इस मौके पर अधिकतम प्रकट होती है. इस तरह का कोई भी मैच किसी स्टेडियम की पिच पर खेला जाता नज़र आते हुए भी सही मायने में वहां नहीं खेला जाता है बल्कि यह मुकाबला करोड़ो-करोड़ दिलों की तंग गलियों में होता है. खेल में हार-जीत का होना स्वाभाविक है और जीत के लिए सभी आदरणीय प्रयास प्रत्येक खिलाड़ी द्वारा किए जाने भी अनिवार्य हैं परंतु प्रतिस्पर्धा का ये भाव मन मस्तिष्क पर इस तरह से हावी हो जाए कि खिलाडी अपनी जीत से ज्यादा विपक्षी टीम की हार को ही सोचने और चाहने लग जाएं तो खेल खेल नहीं रह जाता.
यहां एक चीज बड़ी आसानी से चीन्ही जा सकती है कि ये मुकाबला दोनों ही देशों के वाशिंदों में तथाकथित देशप्रेम को इतना भड़का देता है कि एकबारगी लगने लगता है कि हर कोई देश के लिए मरने मिटने को तैयार है परंतु अगले ही पल महसूस होता है कि ये तथाकथित देशप्रेम वास्तव में देशप्रेम नहीं है बल्कि विपक्षी देश के प्रति स्थाई भाव के रूप में दिलों में बसी घृणा का पर्याय मात्र है. इस प्रार्थना के साथ कि मुझे देशद्रोही नहीं माना जाए मैं ये भी महसूस करता हूं कि इस तरह के मुकाबलों में हमारी घृणा और खीज कुछ इक्कीस नज़र आती है. इस अपेक्षाकृत अधिक उग्रता का एक कारण शायद ये हो कि हम जन्मजात बड़े हैं और इस लिहाज से हमारा मान भी कुछ बड़ा होना ही चाहिए और इसी झोंक में हम हावी होने या नज़र आने की कोशिश करने लगते हैं. इसके विपरीत विपक्षी एक तो जन्मजात छोटा है तिस पर उसका आधा बल बाली की तरह हिंदुस्तान सोख लेता है.
खैर, मेरी चिंता इस तरह के मुकाबले से मानवता को होने वाले नुकसान के प्रति है. क्या ये आयोजन दोनों देशों के बीच जरा-सी भी ठंडी पड़ी घृणा और दुश्मनी को कुरेद-कुरेद नहीं देते? क्या हमारी नई पीढ़ी जो इतिहास की दुर्घटनाओं से वास्ता नहीं रखती, इस तरह के आयोजनों से उनके कोरे दिलों में कोई खारा बीज नहीं पड़ता? सच तो ये है कि इस तरह के अवसर पर दोनों देशों के गली-नुक्कड और घर-घर जैसे सेना की छावनी-से बन जाते हैं. बस गोलियां नहीं चलती बाकी दिलों की दूरियां तो बढ़ती ही हैं. खेल किसी भी समाज अथवा राष्ट्र को दूसरे समाज अथवा राष्ट्र से जोड़ने का काम करते हैं. दो समूहों के माध्यम से दो देशों में पहचान होती है, उनमें रिश्ते जुड़ते हैं और विश्वास पनपता है. भारत पाकिस्तान के बीच का कोई भी मुकाबला क्या खेल की इस भावना को तनिक भी पूरा करता है?
यहां एक और महत्त्वपूर्ण पहलू बाजारवाद है जो अपने लाभ से इतर कुछ भी नहीं देख सकता. बाजार इस आयोजन को खेल से भटकाकर दो देशों की आपसी रंजिश का फायदा उठाता है और इसे उनकी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जोड़कर अपनी जेबें भरता है. टेलीवीजन, मोबाइल कम्पनियां और पत्र-पत्रिकाएं सभी इसमें अपना-अपना हिस्सा बांटते हैं और इसके साथ ही बंट जाती है मानवता भी. यही कारण है कि भारत और पाकिस्तान के बीच कोई भी मैच आपसी वैमनस्य और शक्ति प्रदर्शन का कारण बन के रह जाता है और खेल भावना तिरोहित हो जाती है.
ये सोचा समझा खेल है मित्र। आप और हम सोचते रह जाएंगे लेकिन जिनको जो करना है वो करके ही मानते हैं। ये सारा बवाल अनायास ही नहीं होता मित्र। कहीं न कहीं ये मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिशें, कामयाब कोशिशें है जिनके लिए कभी क्रिकेट और कभी कोई दूसरी चीज बस माध्यम भर है। भारत-पाक मैच की खबरों से पहले की सुर्खियां अब देश के लोग भूल चुके हैं और यह भी उन लोगों के लिए बड़ी उपलब्धि है...
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