welcome on my blog

असुर सदैव बली रहेंगे, क्योंकि सुर तो केवल किसी के भरोसे हैं. ऋत् पर ही सही, निर्भर हैं. और असुर, - दुरभिसंधि मैं लगे ही सही- निरंतर कर्म- तत्पर हैं. - अज्ञेय

Wednesday, 9 March 2011

स्त्री


एक मुद्दत हुई तुम गुमसुम हो
चुपचाप जी रही हो
उनके इशारों पर
कितने कम शब्द रह गए हैं
तुम्हारी भाषा में
एक चुप से निकाल लेती हो कई काम
कितनी कम इच्छाएं रह गई हैं तुम्हारी
उनकी हित कामना ही बन गया है
तुम्हारा जीवन लक्ष्य
कितनी सिमट गई है
तुम्हारी दुनिया
दो देहरी के बीच
क्या ही अच्छा होता कि
बचा पाती तुम
थोड़ी-सी हवा
थोड़ा-सा आकाश
थोड़े-से सपने
और अपने हिस्से का सूरज.


No comments:

Post a Comment