एक मुद्दत हुई तुम गुमसुम हो
चुपचाप जी रही हो
उनके इशारों पर
कितने कम शब्द रह गए हैं
तुम्हारी भाषा में
एक चुप से निकाल लेती हो कई काम
कितनी कम इच्छाएं रह गई हैं तुम्हारी
उनकी हित कामना ही बन गया है
तुम्हारा जीवन लक्ष्य
कितनी सिमट गई है
तुम्हारी दुनिया
दो देहरी के बीच
क्या ही अच्छा होता कि
बचा पाती तुम
थोड़ी-सी हवा
थोड़ा-सा आकाश
थोड़े-से सपने
और अपने हिस्से का सूरज.
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