जब उसे पहले-पहल प्यार हुआ था
शहर के हर मंदिर में
वो उसकी सलामती की दुआ मांगता था
मंदिर और मस्जिद का भेद भी
अक्सर भूल जाता था वो उन दिनों
जब कभी भी सुनाई देती थी अजान की मीठी तान
उसके हाथ दुआ में उठ जाते थे
किसी भी गुरुद्वारे के सामने से
गुजरते हुए
गुनगुनाने लगता था वो
गुरुवाणी-सा कुछ
उन दिनों उसका हर शब्द प्रार्थना था
जब उसे पहले-पहल प्यार हुआ था
परंतु तमाम दुआओं और सज़दों के बावज़ूद
वो उसे नहीं पा सका
और उसकी सलामती की तो उसे खबर भी नहीं है
मंदिर मस्ज़िद गिरिजाघर
कहीं नहीं जाता वो आजकल
प्रार्थना में बंद आंखें
दुआ में उठे हाथ
और सज़दे में झुके माथे
सब कुछ ढकोसला लगता है उसे
प्यार के बिना.
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