विद्यालय की कैंटीन में
चाय-नाश्ता कर रहे विद्यार्थियों से
अनायास ही पूछ बैठा था मैं वो महाभारतीय प्रश्न
संदर्भहीन-सा
एक गरीब अनाथ-से
कम उम्र बच्चे को देखकर
क्या दिखाई दे रहा है तुमको?
तमाम उल्टे-सीधे उत्तरों के बाद भी
जब प्रतीक्षित ही रहा मेरा उत्तर
मेरी सारी भावुकता ज़बान में उतर आई
और ठीक इस समय जबकि
मैं खड़ा हूं स्कूल कैंटीन में
विद्यार्थियों से घिरा
कुछ-कुछ कांपती सी आवाज़ में मैंने कहा-
मैं देख रहा हूं एक ऎसे बच्चे को
जिसकी उम्र तुमसे कुछ कम
या कि बराबर है
जिसके कपड़े तुमसे मैले बहुत मैले हैं
जिसकी आंखों में सुनहरे कल के सपने नहीं
बल्कि नींद के अधूरे टुकड़े अटके हैं
जिसके हाथों में रंगीन चित्रॊं वाली किताब नहीं है
जिसकी अंगुलियां नहीं जानतीं कलम पकड़ना
नहीं लिखा गया जिसका नाम
किसी प्यारे-से स्कूल में
नहीं आती कोई स्कूल बस जिसके लिए
जो बिल्कुल तुम जैसा ही है
उतना ही प्यारा उतना ही भोला और मासूम
मैं देख रहा हूं उस एक बच्चे को
ठीक इस वक्त जबकि
हम खा रहे हैं मंहगी विदेशी चॅाकलेट
उसकी अंगुलियों में अटके हैं
हमारे जूठे गिलास और खाली रैपर
मै देख रहा हूं
उस जैसे उन तमाम बच्चों को
जो बिल्कुल तुम जैसे ही हैं
परंतु........
क्या कोई कविता
बदल पाएगी उनकी तकदीर?
आपकी संवेदनाएं और अभिव्यक्ति अद्भुत है। सार्थक ब्लॉगिंग के लिए बधाई। लगे रहें...
ReplyDeleteकमेंट से word veryfication हटाएं।
ReplyDeleteइसमें काफी परेशानी होती है और वक्त जाया होता है...
राजीव भाई, हम व्यावहारिक बनकर काम करेंगे।
ReplyDeleteकविताएं हमारे मन के भावों का प्रकटीकरण होती हैं।
अभिव्यक्ति, सही समय और अवसर