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असुर सदैव बली रहेंगे, क्योंकि सुर तो केवल किसी के भरोसे हैं. ऋत् पर ही सही, निर्भर हैं. और असुर, - दुरभिसंधि मैं लगे ही सही- निरंतर कर्म- तत्पर हैं. - अज्ञेय

Thursday, 31 March 2011

इस प्रार्थना के साथ कि मुझे देशद्रोही नहीं माना जाए…

पिछले दो-तीन दिनों से भारत और पाकिस्तान के संबंधों को लेकर कई भड़काऊ संदेश मोबाइल पर आ-जा रहे हैं. ज़ाहिर है ऐसा पाकिस्तान में भी हो रहा होगा. कारण दोनों देशों के बीच होने वाला क्रिकेट का सेमी फ़ाइनल मैच है. अब जबकि मैं ये आर्टिकल लिख रहा हूं दूरदर्शन पर मैच चल रहा है. ठीक इसी समय पड़ौसियों के घरों से और गली से भी बार-बार शोर भी सुनाई दे जाता है जो खेल के पक्ष में नही बल्कि भारत के पक्ष में हो रहा है.
          भारत और पाकिस्तान के बीच जब भी कोई क्रिकेट मैच होता है तो मैं बड़े गौर से ये बात देखने की कोशिश करता हूं कि दोनों देश कितने सौहार्द से खेलते हैं? तमाम सावधानी और संतुलन के बावज़ूद दोनों देशों के बीच का स्थाई भाव बीच-बीच में प्रकट हो ही जाता है. खेल और क्रिकेट विशेषK इस मैच की जो व्याख्या करें परंतु इस आयोजन के कुछ दूसरे पहलू जो मुझे लगता है उपेक्षा करने योग्य नहीं हैं, के बारे में मैं अक्सर सोचता हूं. इस मुकाबले का जो सबसे खतरनाक और विचारणीय पहलू है वह इसमें निहित दोनों देशों की एक दूसरे के प्रति कटुता और ऐतिहासिक दुश्मनी है जो इस मौके पर अधिकतम प्रकट होती है. इस तरह का कोई भी मैच किसी स्टेडियम की पिच पर खेला जाता नज़र आते हुए भी सही मायने में वहां नहीं खेला जाता है बल्कि यह मुकाबला करोड़ो-करोड़ दिलों की तंग गलियों में होता है. खेल में हार-जीत का होना स्वाभाविक है और जीत के लिए सभी आदरणीय प्रयास प्रत्येक खिलाड़ी द्वारा किए जाने भी अनिवार्य हैं परंतु प्रतिस्पर्धा का ये भाव मन मस्तिष्क पर इस तरह से हावी हो जाए कि खिलाडी अपनी जीत से ज्यादा विपक्षी टीम की हार को ही सोचने और चाहने लग जाएं तो खेल खेल नहीं रह जाता.
            यहां एक चीज बड़ी आसानी से चीन्ही जा सकती है कि ये मुकाबला दोनों ही देशों के वाशिंदों में तथाकथित देशप्रेम को इतना भड़का देता है कि एकबारगी लगने लगता है कि हर कोई देश के लिए मरने मिटने को तैयार है परंतु अगले ही पल महसूस होता है कि ये तथाकथित देशप्रेम वास्तव में देशप्रेम नहीं है बल्कि विपक्षी देश के प्रति स्थाई भाव के रूप में दिलों में बसी घृणा का पर्याय मात्र है. इस प्रार्थना के साथ कि मुझे देशद्रोही नहीं माना जाए मैं ये भी महसूस करता हूं कि इस तरह के मुकाबलों में हमारी घृणा और खीज कुछ इक्कीस नज़र आती है. इस अपेक्षाकृत अधिक उग्रता का एक कारण शायद ये हो कि हम जन्मजात बड़े हैं और इस लिहाज से हमारा मान भी कुछ बड़ा होना ही चाहिए और इसी झोंक में हम हावी होने या नज़र आने की कोशिश करने लगते हैं. इसके विपरीत विपक्षी एक तो जन्मजात छोटा है तिस पर उसका आधा बल बाली की तरह हिंदुस्तान सोख लेता है.
            खैर, मेरी चिंता इस तरह के मुकाबले से मानवता को होने वाले नुकसान के प्रति है. क्या ये आयोजन दोनों देशों के बीच जरा-सी भी ठंडी पड़ी घृणा और दुश्मनी को कुरेद-कुरेद नहीं देते? क्या हमारी नई पीढ़ी जो इतिहास की दुर्घटनाओं से वास्ता नहीं रखती, इस तरह के आयोजनों से उनके कोरे दिलों में कोई खारा बीज नहीं पड़ता? सच तो ये है कि इस तरह के अवसर पर दोनों देशों के गली-नुक्कड और घर-घर जैसे सेना की छावनी-से बन जाते हैं. बस गोलियां नहीं चलती बाकी दिलों की दूरियां तो बढ़ती ही हैं. खेल किसी भी समाज अथवा राष्ट्र को दूसरे समाज अथवा राष्ट्र से जोड़ने का काम करते हैं. दो समूहों के माध्यम से दो देशों में पहचान होती है, उनमें रिश्ते जुड़ते हैं और विश्वास पनपता है. भारत पाकिस्तान के बीच का कोई भी मुकाबला क्या खेल की इस भावना को तनिक भी पूरा करता है?
            यहां एक और महत्त्वपूर्ण पहलू बाजारवाद है जो अपने लाभ से इतर कुछ भी नहीं देख सकता. बाजार इस आयोजन को खेल से भटकाकर दो देशों की आपसी रंजिश का फायदा उठाता है और इसे उनकी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जोड़कर अपनी जेबें भरता है. टेलीवीजन, मोबाइल कम्पनियां और पत्र-पत्रिकाएं सभी इसमें अपना-अपना हिस्सा बांटते हैं और इसके साथ ही बंट जाती है मानवता भी. यही कारण है कि भारत और पाकिस्तान के बीच कोई भी मैच आपसी वैमनस्य और शक्ति प्रदर्शन का कारण बन के रह जाता है और खेल भावना तिरोहित हो जाती है.
           क्या हम ये प्रार्थना नहीं कर सकते कि अगली बार भारत और पाकिस्तान के बीच मैच देखते समय हमारा समर्थन और विरोध हृदय की भीतरी घृणा और कटुता से लिथड़ा नहीं होगा बल्कि हमारी सद्भावना किसी खिलाड़ी और खेल के प्रति होगी. बेशक देश तो हमें अपना ही प्यारा है परंतु खेल और खिलाड़ी तो किसी भी देश का प्रिय हो सकता है.

Saturday, 26 March 2011

जिनका नाम किसी विद्यालय में नहीं लिखा गया.........


विद्यालय की कैंटीन में
चाय-नाश्ता कर रहे विद्यार्थियों से
अनायास ही पूछ बैठा था मैं वो महाभारतीय प्रश्न
संदर्भहीन-सा
एक गरीब अनाथ-से
कम उम्र बच्चे को देखकर
क्या दिखाई दे रहा है तुमको?
तमाम उल्टे-सीधे उत्तरों के बाद भी
जब प्रतीक्षित ही रहा मेरा उत्तर
मेरी सारी भावुकता ज़बान में उतर आई
और ठीक इस समय जबकि
मैं खड़ा हूं स्कूल कैंटीन में
विद्यार्थियों से घिरा
कुछ-कुछ कांपती सी आवाज़ में मैंने कहा-
मैं देख रहा हूं एक ऎसे बच्चे को
जिसकी उम्र तुमसे कुछ कम
या कि बराबर है
जिसके कपड़े तुमसे मैले बहुत मैले हैं
जिसकी आंखों में सुनहरे कल के सपने नहीं
बल्कि नींद के अधूरे टुकड़े अटके हैं
जिसके हाथों में रंगीन चित्रॊं वाली किताब नहीं है
जिसकी अंगुलियां नहीं जानतीं कलम पकड़ना
नहीं लिखा गया जिसका नाम
किसी प्यारे-से स्कूल में
नहीं आती कोई स्कूल बस जिसके लिए
जो बिल्कुल तुम जैसा ही है
उतना ही प्यारा उतना ही भोला और मासूम
मैं देख रहा हूं उस एक बच्चे को
ठीक इस वक्त जबकि
हम खा रहे हैं मंहगी विदेशी चॅाकलेट
उसकी अंगुलियों में अटके हैं
हमारे जूठे गिलास और खाली रैपर
मै देख रहा हूं
उस जैसे उन तमाम बच्चों को
जो बिल्कुल तुम जैसे ही हैं
परंतु........
क्या कोई कविता
बदल पाएगी उनकी तकदीर?

Wednesday, 16 March 2011

गरीब की हो_ली


रामजीलाल की घरवाली की चिंता
दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही थी
घर का राशन
सास की बीमारी
बड़की की शादी
छुटकी की स्कूल
और ऊपर से ये त्योहार
उसने अपने रोते हुए बच्चे को
जो किसी खिलौने की ज़िद कर बैठा था
ये कहकर चुप करा दिया था
कि दस दिन बाद जब होली आएगी
वो उसे एक सुंदर-सा खिलौना दिलाएगी
गरीब के बच्चे का धीरज बड़ा होता है
मा की इस बात ने बच्चे पर जादू का सा असर किया
और वो चुप्प हो गया
उस दिन के बाद बच्चे ने कभी ज़िद नहीं की परंतु
जैसे-जैसे होली का दिन नज़दीक आ रहा है
जाने क्यूं मा अंदर ही अंदर घुट-सी रही है
जिस पल से बच्चा चुप हुआ है
मा की मौन व्यथा कई गुना बढ़ गई है
लो होली तो आ गई.

Wednesday, 9 March 2011

स्त्री


एक मुद्दत हुई तुम गुमसुम हो
चुपचाप जी रही हो
उनके इशारों पर
कितने कम शब्द रह गए हैं
तुम्हारी भाषा में
एक चुप से निकाल लेती हो कई काम
कितनी कम इच्छाएं रह गई हैं तुम्हारी
उनकी हित कामना ही बन गया है
तुम्हारा जीवन लक्ष्य
कितनी सिमट गई है
तुम्हारी दुनिया
दो देहरी के बीच
क्या ही अच्छा होता कि
बचा पाती तुम
थोड़ी-सी हवा
थोड़ा-सा आकाश
थोड़े-से सपने
और अपने हिस्से का सूरज.


Tuesday, 1 March 2011

प्यार के बिना


जब उसे पहले-पहल प्यार हुआ था
शहर के हर मंदिर में
वो उसकी सलामती की दुआ मांगता था
मंदिर और मस्जिद का भेद भी
अक्सर भूल जाता था वो उन दिनों
जब कभी भी सुनाई देती थी अजान की मीठी तान
उसके हाथ दुआ में उठ जाते थे
किसी भी गुरुद्वारे के सामने से
गुजरते हुए
गुनगुनाने लगता था वो
गुरुवाणी-सा कुछ
उन दिनों उसका हर शब्द प्रार्थना था
जब उसे पहले-पहल प्यार हुआ था
परंतु तमाम दुआओं और सज़दों के बावज़ूद
वो उसे नहीं पा सका
और उसकी सलामती की तो उसे खबर भी नहीं है
मंदिर मस्ज़िद गिरिजाघर
कहीं नहीं जाता वो आजकल
प्रार्थना में बंद आंखें
दुआ में उठे हाथ
और सज़दे में झुके माथे
सब कुछ ढकोसला लगता है उसे
प्यार के बिना.
 
           

क्योंकि बच्चे किताबें फाड़ देते हैं…...


शहर के एक प्रतिष्ठित विद्यालय के पुस्तकालय की किताबों से भरी अलमारियों को ताला लगाके रखा गया है क्योंकि उनके खुला रहने पर कुछ विद्यार्थी पुस्तकें चुरा ले जाते हैं या उन्हें फाड़ देते हैं. यहां मूल प्रश्न विद्यार्थियों की अनुशासनहीनता का नहीं है बल्कि पुस्तकालय की अलमारियों को ताला लगाने का है. वास्तव में ये एक गंभीर किस्म की गलती है, भले ही ये अनजाने में ही क्यों ना की जा रही हो.
            ये बड़ा स्वाभाविक है कि कुछ विद्यार्थी पुस्तकालय की मर्यादा को भंग कर सकते हैं मसलन, कुछ किताबों के पृष्ठ फाड़ लेना या कि किसी किताब को चुरा लेना. परंतु लड़कपन की इस नासमझी के कारण पुस्तकालय की अलमारियों को ताला लगा देना विद्यार्थियों में पनप रहे पुस्तक प्रेम के संस्कार की भ्रूणहत्या है. क्या ये वाकई बहुत बड़ी चिंता का विषय नहीं है कि मनुष्य को संस्कारित करने वाली और समाज को रहने लायक बनाने वाली किताबों को बच्चों से दूर रखा जा रहा है. ये कहना जरा मुश्किल है कि ठीक ऎसा ही कितने विद्यालयों में हो रहा है, परंतु विद्यालयी पुस्तकालयों में विद्यार्थियों के बेहिचक प्रवेश और आवा-जाही की संस्कृति विकसित होना अभी शेष है. मुझे अपने बचपन का विद्यालय याद आता है जिसके पुस्तकालय के अंधेरे-से कमरे की किताबों से लदी-फदी बड़ी-बड़ी अलमारियां मुझमें रहस्य और आकर्षण का एक अजीब-सा भाव जगाती थीं.परंतु कभी बेहिचक उसमें आने-जाने और किताबों को देखने-छूने की कोई परंपरा उस समय मेरे लिए रही हो, मुझे याद नहीं आता. कमोबेस यही स्थिति आज भी कायम है. बल्कि ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि विद्यालयी स्तर पर पनपा पुस्तकों से दूरी का ये संस्कार ही आगे जाकर लेखकों और प्रकाशकों की इस शिकायत का कारण बनता है कि लोग पुस्तक नहीं पढ़ते.
     क्या ये अच्छा नहीं हो कि पुस्तकालय के किसी एक कोने में विभिन्न विषयों की ढेर सारी रोचक और मज़ेदार किताबें किसी टेबल पर इस तरह रखी जाएं कि बच्चे उन की ओर लुभाएं और उन्हें पढ़ें. क्या हमारे विद्यालयी पुस्तकालयों को आधुनिक बाज़ार की तरह नहीं होना चाहिए जहां हर चीज बिना मांगे-चाहे जबरदस्ती दिखाई जाती है. देखा जाए तो बच्चों में पुस्तक प्रेम विकसित करना और पढ़ने की स्वाभाविक प्रवृति का विकास करना ही विद्यालयी पुस्तकालयों का मुख्य उद्देश्य भी होता है. मैं ये मानता हूं कि बिना इस बात का इंतजार किए कि बच्चों में पढ़ने और चुनने की समझ विकसित हो, उन्हें ढेरों किताबों के बीच रहने दिया जाए तो बहुत जल्दी उनमें चुनाव और रुचि दोनों का विकास हो जाएगा. वास्तव में किताबों का आस-पास रहना ही व्यक्ति में सकारात्मक बदलाव ला देता है. रद्दी और पुरानी किताबें बेचने वाला अनपढ़-गंवार भी आचरण में शिष्ट होता है.
किसी भी जीवंत पुस्तकालय की अलमारियां कभी भी व्यवस्थित नहीं रह सकतीं और ये कहना ठीक ही होगा कि पुस्तकों पर धूल जम जाए इससे अच्छा है कि उन्हें देते-लेते रहा जाए. साथ ही किसी सीलन भरी अलमारी के बंद ताले में सड़ जाने से तो कहीं अच्छा है कि हमारी कुछ किताबों के पन्ने फ़ाड़ लिए जाएं या कि उन्हें चुरा लिया जाए. पढ़ते-पढ़ाते किसी किताब का फ़ट जाना बेहतर भविष्य का संकेत है.