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असुर सदैव बली रहेंगे, क्योंकि सुर तो केवल किसी के भरोसे हैं. ऋत् पर ही सही, निर्भर हैं. और असुर, - दुरभिसंधि मैं लगे ही सही- निरंतर कर्म- तत्पर हैं. - अज्ञेय

Sunday, 3 July 2011

तरक्की (लघुकथा)


शर्मा जी विभाग में ऊंचे पद पर थे. विभाग ने उन्हें कुछ सरकारी पदों पर भर्ती के लिए साक्षात्कार बोर्ड के सदस्य के रूप में चुना था. बोर्ड में भी वो सबसे सीनियर थे और उनकी बात को ना टाल सकने जैसी स्थिति थी. सूचना क्रांति के इस भीषण युग में किसी प्रतिभागी ने इस जानकारी का फायदा उठाया और शर्मा जी पर वो वार किया कि उन्हें संभलने का मौका ही नहीं मिला. ऐसे किसी प्रलोभन के लिए उनकी कोई पूर्व तैयारी नहीं थी और यही कारण रहा कि तीस साल की बेदाग नौकरी में ये बट्टा लग गया. पांच लाख की मोटी रकम देखकर शर्मा जी एकदम से इनकार नहीं कर सके. परंतु शर्मा जी को इसका अभ्यास नहीं था और यही कारण था कि सुद्ध लाभ के बावज़ूद उनकी आत्मा जैसे कचोट रही थी. उनके लिए वो पल भी बेहद कष्टदायक गुजरा था जब उन्होंने उस प्रतिभागी को लगभग बिना किसी मूल्यांकन के पास किया था.
                      पिछले एक महीने से वो इस अपराध बोध से दबे जी रहे थे. उनका ये अपराध बोध तब और भीषण हो उठता जब उन्हें याद आता कि उनके इस पक्षपात के कारण उसी परीक्षा में शामिल मौहले का एक बेहद गरीब परंतु होनहार प्रतिभागी असफल हो गया है. लेटे-लेटे उन्हें महसूस हुआ जैसे कोई हिंसक पशु अपनी खुरदुरी पैनी जीभ से उनके फेफडों, दिल और यकृत को चाट रहा है. वो और अधिक बरदाश्त नहीं कर सके. दबे पांव उठे. रात के कोई दो बजे रुपयों से भरा सूटकेस उठाया और चुपचाप घर से निकल गए. लगभग पांच मिनट में वो उस घर के सामने पहुंच गए जिसके वो अपराधी थे. जो अपराध वो कर चुके थे उसको सुधारने का और कोई तरीका उन्हें नजर नहीं आ रहा था. घर के सामने पलभर को ठिठके फिर ना जाने किस प्रेरणा से बिना डरे सोते हुए लोगों के बीच पहुंच गए. धीरे से सूटकेस रखा और बिना रुके उल्टे पांव लौट आए. अगले ही पल उन्हें महसूस हुआ जैसे उनके जिस्म और आत्मा से हजारों टन वजन हट गया है. उनका तन-मन किसी ताजा खिले फूल की तरह महक रहा था जिसकी खुशबू हवाओं में घुलकर दूर-दूर तक पहुंच रही थी. उन्हें लगा जैसे रातों-रात उनकी तरक्की हो गई है और वो किसी बहुत ऊंचे पद पर पहुंच गए हैं. उस रात के जैसी मीठी नींद उन्हें कभी नहीं आई थी.  

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