भ्रष्टाचार, कालेधन और लोकपाल बिल को लेकर जो देशव्यापी आंदोलन छिइा है उसका अगर एक ईमानदार नजर से मूल्यांकन किया जाए तो कुछ बातें बेहद साफ और आसानी से समझ में आने लायक हैं. मसलन पक्ष और विपक्ष के आरोपों-प्रत्यारोपों के बावजूद ये स्पष्ट रूप से समझा सा सकता है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव किसी व्यक्तिगत, राजनीतिक, अथवा आर्थिक लाभ की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि उनकी सभी मांगें राष्ट्रहित में उठाई गई जायज मांगें हैं. इन दोनों ही आंदोलनों अथवा मुद्दों को मिला व्यापक जन समर्थन और सरकार द्वारा इनको दबाए जाने की असंवैधानिक कोशिश भी इस बात को एकदम साफ कर देती है कि इन मुद्दों से वास्तविक खतरा किन लोगों को है. भ्रष्टाचार और कालेधन से मोटी मलाई मारने वाले सुविधाजीवी (चाहे वो किसी भी वर्ग अथवा क्षेत्र से हों) सभी एक ही स्वर में जिस तयसुदा भाषा में आंदोलन के विरोध में बोल रहे हैं इससे उनका अपराध और उसमें साझेदारी स्वत: स्पष्ट है. यहीं पर यह भी गोर करने लायक है कि बहुत सारे पूंजिपति जिनमें सभी वर्गों अथवा क्षेत्रों के लोग शामिल हैं, एक सोची-समझी चुप्पी के द्वारा इन विरोधियों का समर्थन कर रहे हैं. यानी वो जो इस आंदोलन के विरोध में बोल रहे हैं और वो जो एकदम चुप्प हैं, दोनों ही एक दूसरे का समर्थन करते हुए अपना समर्थन और बचाव कर रहे हैं.
यह एक बड़ी सच्ची धारणा है कि किसी भी तरह की शासन व्यवस्था अंतत: लोकतांत्रिक मूल्यों और सिद्धांतों के दमन का कारण बनती है बल्कि उनका दमन करके ही वह स्थापित रह सकती है. वर्तमान आंदोलन और उसके दमन के संबंध में भी यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि इस आंदोलन से जिन मुद्दों को उठाया जा रहा है वह सत्ता और उसके अस्तित्व के लिए एक चुनौती है. भले ही वह चुनौती पूरी तरह लोकतांत्रिक और वैधानिक ही क्यों ना हो. अत: इस आंदोलन का दमन सत्ता के बचे रहने के लिए जरूरी है दुष्यंत के ’ ये एहतियात जरूरी है इस बहर (व्यवस्था) के लिए’ की तरह. यही कारण है कि सत्ता की तरफ से सिद्धांत और नीति कहीं सिरे से ही गायब है.
इस आंदोलन में एक और बात जो बड़ी महत्वपूर्ण रही वह है आरोप-प्रत्यारोप का बेलगाम सिलसिला. सरकार और उसके साझेदारों द्वारा बाबा रामदेव और अन्ना हजारे पर बार-बार लगाए गए आरोप ’ तू भी चोर मैं भी चोर , अत: हमें साथ-साथ होना चाहिए’ की नीति को उजागर करते हैं. यह नीति सत्ता के साझेदारों की चालाक नीति होती है और मजबूरी होने पर बड़े चोरों द्वारा छोटे चोरों को सत्ता में साझेदारी का और छोटे से बड़ा चोर बनने का अवसर प्रदान करती है. सत्ता में हिस्सेदारी के लालच और विरोध से उत्पन्न संभावित खतरों के भय के कारण यह नीति अक्सर सफल भी हो जाती है. परंतु किसी भी व्यवस्था में बदलाव सभ्यताओं के विकास का अनिवार्य घटन है और कोई भी व्यवस्था चिरस्थायी नहीं रह सकती. वर्तमान आंदोलन किसी सभ्यता के विकास का वही अनिवार्य मोड़ है जिससे हर सभ्यता समय- समय पर गुजरती रहती है.
तमाम आरोपों के बावजूद बाबा रामदेव खुद को बेदाग बता रहे हैं और अगर नहीं भी हैं तब भी शोर मचाने की जरूरत नहीं है क्योंकि हम व्यवस्था में जिस परिवर्तन के लिए लड़ रहे हैं उसकी ज़द में तो हर कोई है. फिलहाल हमारा भरसक प्रयास व्यवस्था परिवर्तन के लिए उठे इस आंदोलन की सफलता के लिए होना चाहिए. मीन-मेख तो बाद में भी निकाली जा सकती है. यहीं पर पूरे आंदोलन के प्रति मीडिया की भूमिका भी सराहनीय रही है. अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए ही सही, मीडिया ने आंदोलन के पक्ष में माहोल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.वास्तव में देखा जाए तो आधुनिक मीडिया अब केवल मोटे घरानों और रसूखदारों से ही नहीं चलता बल्कि कभी-कभी ही सही आम जनता भी उसमें सनसनी जगाती है और उसके लाभ लायक परिस्थितियां पैदा करती है.
और अंत में एक और बेहद जरूरी सवाल. यह जान लेने के बाद भी कि यह आंदोलन पूरी तरह से राष्ट्रीय हितों के लिए हो रहा है और हम इसका समर्थन करते हैं, क्या यह प्रश्न उठना स्वाभाविक नहीं है कि हममें से कितनों को यह नैतिक अधिकार है कि हम भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना मुखर हो सकते हैं? क्या हम सभी ने अपने-अपने हिस्से और अवसर के अनुसार चोरी नहीं की है? व्यक्तिगत मूल्यांकन और बदलाव के साथ अगर हम आगे बढ़ेंगे तो हमारी आवाज की ताकत भी शायद बढ़ी हुई होगी.
हमें शुरुआत खुद से ही करनी होगी। यही सही रास्ता है परिवर्तन का। लेकिन इससे कोई मानने को ही तैयार नहीं। कानून मात्र से ही सारा भ्रष्टाचार रुक जाएगा, यह सोचना एकदम गलत है। फिर भी कड़े कानूनों की तो आवश्यकता है ही। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे और उनकी टीम ने जो शुरुआत की है, उसकी जितनी सराहना की जाए कम है। लेकिन इस लड़ाई से आम आदमी को जुड़ना होगा। कम से कम वे तो जुड़ जाएं जिन्हें आज तक कभी किसी तरह के भ्रष्टाचार का अवसर ही नहीं मिला। उन्हें किस बात का डर है?
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