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असुर सदैव बली रहेंगे, क्योंकि सुर तो केवल किसी के भरोसे हैं. ऋत् पर ही सही, निर्भर हैं. और असुर, - दुरभिसंधि मैं लगे ही सही- निरंतर कर्म- तत्पर हैं. - अज्ञेय

Saturday, 28 May 2011

समानता (लघुकथा)

एक आधुनिक टाइप का शहर था. शहर के विश्वविद्यालय में एक लड़का और एक लड़की पढ़ते थे. हां और भी कई लड़के-लड़कियां पढ़ते थे परंतु हमारी कोशिश इस घटना को कहानी बनाने से बचाने की है. हां तो एक लड़का और एक लड़की. दोनों जवान थे और लड़की खूबसूरत भी थी. लड़के की जवानी और लड़की की खूबसूरती किसी भी घटना के लिए पर्याप्त कारण है. तो फिर इस पर मत जाइए कि लड़का खूबसूरत था कि नहीं. हां तो आगे बढ़ते हैं. दोनों के बीच वही हुआ जो प्रसाद जी की कामायनी में मनु और श्रधा के बीच होता है, हां वही, प्यार. यहां पर थोड़ा-सा क्षेपक है. बाकी प्रेम कहानियों से हटकर दोनों की शादी हो जाती है. चूंकि ये कहानी नहीं है इसलिए प्यार से शादी के बीच की बाधादौड़ हटा दी गई है. अभी शादी को सालभर ही हुआ था कि लड़का एक सरकारी नौकरी पाकर सुदूर असम में नियुक्त हो जाता है. भावुकता पूर्ण विदाई के बाद लड़की विश्वविद्यालय में पढ़ाई जारी रखती है और लड़का असम में नई जिम्मेदारियां निभाता है.
लगभग छह महीने बाद-
लड़का छुट्टी लेकर उसी शहर में लौटकर आता है. रात के लगभग ग्यारह बजे वह शहर के स्टेशन पर उतरता है. यहां कुछ बातें जान लेना जरूरी है क्योंकि किसी भी घटना के लिए कुछ जरूरी परिस्थितियां होती है जिनको जाने बिना बात की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है. जानने योग्य बातों में सबसे पहली बात; लड़की विश्वविद्यालय के होस्टल में रहती थी. दूसरी, लड़की जो अब उसकी पत्नी भी थी का मोबाइल  बंद था और तीसरी सावन की रिमझिम बरसती-थमती काली रात को ध्यान में रखें तो घटना की संगती ठीक-ठीक बैठेगी. हां तो इन सब बातों के परिणामस्वरूप लड़का स्टेशन के पास ही किसी होटल में रात गुजारने की योजना बनाता है.  होटल के कमरे में पहुंचते ही उसके मन में एक विकार जन्म लेता है जो पूरी घटना के लिए बीज का काम करता है. थोड़े मोल-भाव के बाद होटल का लड़का व्यवस्था कर देता है. लगभग आधे घंटे बाद उसके कमरे की कॉलबेल बजती है. रगों में दौड़ते लहू को संयमित करता हुआ वह ज्यों ही दरवाजा खोलता है वह घटना घट जाती है जिसका इंतजार आप कर रहे हैं. दरवाजे पर उस नौजवान की वही बीवी खड़ी थी जिसका मोबाइल बंद था और जिसे सावन की इस अंधेरी रात में पाना नौजवान को असंभव लग रहा था. इस दृश्य को देखकर देवताओं ने फूल बरसाए अथवा नहीं ये तो जानकारी नहीं है परंतु स्त्री-पुरुष की समानता के पक्षधर लोगों ने जरूर तालियां बजाई. पति-पत्नी को समानता के ऐसे धरातल पर फिर कभी किसी ने नहीं देखा. नौजवान के कमरे से संगीत की मधुर पार्श्व ध्वनि सुनाई दे रही थी, मन क्यूं बहका रे बहका आधी रात को..........???

Thursday, 19 May 2011

बदलाव

जब मैं गांव से गुजरा
पनघट सूना था
ना रस्सी थी ना बाल्टी
जगत टूटी थी
और घिरनी भी
कुछ आगे पीपल के नीचे
धूप सुस्ता रही थी
अकेली... एकदम अकेली
और कुछ आगे
जहां बैठा करती थी गायें
किसी ने अतिक्रमण कर लिया
मैंने देखा...
ऊंचे कंगूरे पर बैठा था एक गिद्ध
और कुछ कौवे भी
कि अचानक मेरी नज़र घूमी
मंदिर के बगल में मस्ज़िद बनी थी
देखकर आगे बढ़ गया
कच्ची गली से सड़क पर चढ़ गया
और जहां उड़ा करती थी गोधूलि
सिर्फ धूल नज़र आई
जब मैं गांव से गुजरा......

Friday, 6 May 2011

कारीगर


वो देख रहे थे
नए बने एक भवन को
भवन जिसके निर्माण के लिए
कई बैठकें हुई थीं
पास हुआ था एक बहुत बड़ा बजट
जिसका कुछ हिस्सा
बंट गया था इधर-उधर
एक-दूसरे को खुश करने में
अब बनकर तैयार था
अहं भाव से निहारते हुए
कुछ कतर-ब्योंत
कुछ सलाहों और मशवरों के साथ
लगभग-लगभग संतुष्ट थे सभी
तमाम आशंकाओं के बावज़ूद ईंटें कम नहीं पड़ी थीं
औपचारिक निरीक्षण के बाद.......
खाली भवन में गूंज रहे थे
उनके सजावटी ठहाके
नए भवन को सराहते हुए
सब चले गए थे
संतुष्टी की कोफी पीने
मगर किसी ने नहीं देखा
धूल-मिट्टी में सना एक कारीगर
अभी भी घुल रहा था
दो जून  की चिंता में
बीन रहा था कंकड़-पत्थर
छूट गए थे जो
भवन बनाते समय इधर-उधर
किसी ने नहीं चीन्हा
किसी ने नहीं सराहा
उसके काम को
उस जैसे हजारों कारीगरों को
अक्सर छूट जाते हैं जो
इमारत बन जाने पर
इधर-उधर............. कंकड़-पत्थर की तरह.