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असुर सदैव बली रहेंगे, क्योंकि सुर तो केवल किसी के भरोसे हैं. ऋत् पर ही सही, निर्भर हैं. और असुर, - दुरभिसंधि मैं लगे ही सही- निरंतर कर्म- तत्पर हैं. - अज्ञेय

Wednesday, 14 September 2011

हिंदी के पक्ष में....


हर बार की तरह इस बार भी हिंदी दिवस की सुगबुगाहट सुनाई देने लगी है.सितंबर का महीना जैसे ही शुरु होता है विभिन्न सरकारी कार्यालयों में हिंदी के श्राध की तैयारी भी शुरु हो जाती है. हिंदी दिवस और हिंदी पखवाड़ा मनाने की मुनादी के साथ-साथ इस अति पावन दिन के लिए ढेरों शुभकामनाओ का वर्ष भर से जमा स्टोक खाली किया जाने लगता है. विगत के हिंदी पत्रों की तारीख बदलकर उन्हें नए तरीके से प्रेषित करने योग्य बनाया जाता है. वर्ष भर से बेकार बैठे नुक्कड़ के पेण्टर की कूची भी बैनर और पोस्टर बनाने में जुट जाती है और १४ सितम्बर आते ना आते सभी कार्यालय हिंदी के नारों से सज जाते हैं. दोस्तो आज हिंदी दिवस है ! नेता से लेकर अफसर तक, प्रोफेसर से लेकर विद्यार्थी तक सभी हिंदी को लेकर चिंतित नजर आते हैं. भाषण, बहसें और वाद-विवाद के बीच कुछ बेहद लोकप्रिय कविताएं पढ़ी जाती हैं. उक्ति-सूक्ति की कुछ ऐसी धारा बहती है कि सबकुछ हिंदीमय हो जाता है और एकबारगी तो लगने लगता है कि हिंदी का सवाल अब हल हुआ ही चाहता है कि तभी अध्यक्षीय भाषण देते हुए मुख्य अतिथि महोदय की जीभ लड़खड़ा जाती है और वो ना चाहते हुए भी दो चार वाक्य अंग्रेजी के बोल ही जाते हैं. इस प्रकार हिंदी की चिंता से शुरु हुआ समारोह अंग्रेजी के महत्त्व पर समाप्त होता है. सुनने वाले नेति-नेति कहते हुए घर को प्रस्थान करते हैं.
                       कुलमिलाकर दो टूक ये कि हिंदी को लेकर पूरा आयोजन महज एक मखौल बनकर रह जाता है और भाषा का प्रश्न अपनी जगह यथावत बना रहता है.
               वस्तुत: हिंदी की समस्या ये है कि वो भारत के सभी हिस्सों में समानरूप से बोली और समझी नहीं जाती है और यही कारण है कि उसको लेकर लोगों की राय भिन्न-भिन्न है. राजभाषा और राष्ट्रभाषा का प्रश्न इसके पीछे आता है. हिंदी को लेकर दूसरा बड़ा प्रश्न इसे शिक्षा का माध्यम बनाए जाने से संबंधित है.इन दोनों ही प्रश्नों का समाधान हिंदी दिवस नहीं हो सकता. पहले प्रश्न का हल ज्यादा मुश्किल नहीं है बशर्ते पूरी इछा शक्ति से एक राष्ट्रभाषा नीति अपनाई जाए. जिस प्रकार किसी परिवार के भिन्न-भिन्न भाषा बोलने वाले पांच सदस्यों के बीच संवाद और लगाव के लिए एक ऐसी भाषा की जरूरत होती है जिसे पांचों सदस्य सहजता से समझ और बोल सकें उसी प्रकार किसी राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाए रखने तथा उसके नागरिकों में परस्पर संवाद बनाने हेतु एक राष्ट्रभाषा की दरकार रहती है. देखा जाए तो यही हिंदी की मुख्य भूमिका है और यही मुख्य चुनौती भी. हिंदी को देशभर में इस भूमिका के लिए तैयार करने हेतु एक बेहद सरल और अविवादित भाषा नीति की जरूरत है. जिसके अंतर्गत देश के सभी प्रांतों में कक्षा १ से १० तक हिंदी का एक ऐसा अनिवार्य पाठ्यक्रम लागू किया जाए जिसका उद्देश्य हिंदी का व्यावहारिक ज्ञान देने के साथ-साथ देश की सभ्यता, संस्कृति, इतिहास और चरित्र का परिचय देने और उनके प्रति गौरव की भावना भरने का होना चाहिए. इसके विस्तार और रूपरेखा निर्माण के लिए तमाम जरूरी विशेषज्ञो और प्रतिनिधियों का सहयोग लिया जा सकता है. हिंदी सेवी संस्थाएं और हिंदी प्रेमी तो हैं ही. इस तरह की कोई भी नीति यदि पूरी ईमानदारी और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर लागू की जाए तो निसंदेह किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी और कुछ ही वर्षों में देश में एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो जाएगी जिसे ना केवल हिंदी में काम करने की योग्यता और उसका व्यावहारिक ज्ञान होगा बल्कि भाषा के प्रति सम्मान की भावना के साथ-साथ देश के गौरवशाली अतीत और उसके राष्ट्रीय चरित्र की भी जानकारी होगी. कुछ वर्षों बाद जब हम इस स्थिति में हों कि पूरा भारत हिंदी में काम करने की क्षमता को अर्जित कर चुका हो तो राजभाषा पर भी पुनर्विचार किया जा सकता है. स्पष्ट तौर पर इसके लिए दृढ इच्छा शक्ति और नीयत की ईमानदारी नितांत जरूरी है. राजभाषा के प्रश्न को सुलझा लेने तथा राष्ट्रभाषा के प्रति गौरव का भाव विकसित हो जाने पर हिंदी के दूसरे प्रश्न शायद इतने जटिल नहीं रह जाएंगे. मसलन शिक्षा का माध्यम क्या हो या क्षेत्रीय भाषाओं के प्रश्न आदि. क्योंकि जैसा कि पूर्व कहा गया राष्ट्रभाषा की मूख्य भूमिका राष्ट्र की संकल्पना को मूर्त करना और राष्ट्रीयता की भावना जगाना है. हां, यहां पर ये परिवर्तन या सुधार जरूर अपेक्षित है कि अंग्रेजी के साथ-साथ राष्ट्रभाषा हिंदी में भी उच्च शिक्षा के सभी अवसर उपलब्ध करवाए जाएं और उन्हें सम्मान की नजर से देखा जाए क्योंकि अंग्रेजी पढ़ना हमारे लिए उतना खतरनाक नहीं है जितना हिंदीं को ना पढ़ना. भाषा किसी देश के राष्ट्रीय चरित्र का संवहन करती है और हिंदुस्तान में ये भूमिका हिंदी ही निभा सकती है. उसे अनिवार्य रूप से पढ़ना निस्संदेह हमारे मन में देशभक्ति की भावना जगाएगा. कम से कम एक कोशिश तो की ही जा सकती है.

Saturday, 3 September 2011

ठेले पर आदमी


पेड़ की छाया में
ठेले पर लेटे उस आदमी को
जब मैंने जगाया
तो किसी सिपाही की तरह
चौकन्ना होकर उठ बैठा था वह
मेरी हल्की-सी आवाज ने
उसकी नींद से भरी आंखों में
उम्मीद के दीये-से जला दिए थे
काम बताकर जब मैंने पैसे पूछे
बड़ी सहजता से बोला वह
सत्तर रुपये
होशियारी दिखाते हुए मैंने कहा
पचास रुपये ठीक रहेगा... ?
मेरी होशियारी जो किसी काम नहीं आई थी
उस समय पस्त पड़ गई
जब उसने कहा-
बाबूजी ! सौ रुपये ले लूंगा
तब भी कल ठेला ही चलाना पड़ेगा
उसकी इस एक बात ने
मुझे जैसे पानी-पानी कर दिया
सचमुच कितना गहरा जीवन बोध था
उसके इस आत्मकथ्य में
ठेला चलाना और
ठेला चलाते हुए जिंदगी गुजार देना
दो मुख्तलिफ़ बातें हैं
सड़क पर खड़ा
मैं देर तक अपनी औकात
और उसकी हैसियत के बारे में सोचता रहा.